Maharana pratap history in hindi language. Maharana Pratap history in Hindi 2019-01-09

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मेवाड़ राजवंश का संक्षिप्त इतिहास

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As a last resort, Akbar sent another great warrior General Jagannath in the year 1584 with a huge army to Mewar but after trying relentlessly for 2 years, even he could not catch Rana Pratap. ऐसा जादू था महाराणा के नाम में की जो सुनता वह उनके लिए आगे बढ़कर सहयोग देने को तैयार हो जाता. पत्र पढ़ते पढ़ते महाराणा का मुख लाल हो गया. हमें केवल प्रतिरक्षा ही नहीं करनी है, अपितु राजपूती शोर्य से ऐसा इतिहास लिखना है जिसे पढ़ते समय इतिहास हम पर गर्व करें. जहाँ भी नजर जाते थी बरसाती बादलों के तरह फैले मुग़ल सेना के तम्बू नजर आ रहे थे. शक्तिसिंह समझ गया की मुग़ल शहजादा से भरी इनाम के लालच में घायल राणा प्रताप का पीछा कर रहे है. जो कुछ भी दरबार में हुआ उससे उसका मन खिन्न हो गया.

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Maharana Pratap Real Story

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तब तक कुछ सैनिक वहां आ पहुंचे और और शहजादे सलीम को यह सूचना दी की शक्तिसिंह को मुग़ल छावनी में देखा गया है. प्रताप युवा थे, प्रदीप्त सूर्य की तरह उनका चेहरा दैदीप्यमान था. उसे अपनी वीरता पर बहुत घमंड है. स्वयं महाराणा प्रताप के भाई और भतीजे विरोधी खेमे में चले गए थे. तुम तो उसे परम विवेकी और सुलझा हुआ शासक समझते थे. बच्चों के साथ खेल खेल में ही दल बना लेते थे और ढाल तलवार के साथ युद्ध करने का अभ्यास करते थे.

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महाराणा प्रताप का इतिहास Maharana Pratap History in Hindi with PDF

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जगमाल की राजनितिक सूझ-बुझ कमजोर थी, राज काज को संभालने एवं व्यक्ति को परखने वाली पैनी नजर उसमे बिलकुल भी न थी, वो अब केवल अपने आप को बहुत महत्व देने लगा था. इन्ही दिनों राणा प्रताप भी युद्धाभ्यास के लिए जंगल जाया करते थे. दूसरी तरफ अफ़गानी राजाओं ने प्रताप का साथ निभाया, इनमे हाकिम खान सुर ने प्रताप का आखरी सांस तक साथ दिया. इस युद्ध में जगमाल मारा गया. और फिर वहां से अचानक निकल कर बिजली की तेज़ी से आक्रमण करते है. अकबर ने अपमान की पीड़ा में जलती मानसिंह की आँखों में देख कर बोला, अब तो तुम्हारे अपमान करने की सजा प्रताप को अवश्य मिलेगी, जाओ युद्ध की तैयारियां करो और मेवाड़ की ईट से ईट बजा दो.

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मेवाड़ राजवंश का संक्षिप्त इतिहास

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अकबर को प्रणाम कर मानसिंह वहां से चला गया. उसी समय बीच में एक बड़ी नदी आ जाती हैं जिसके लिए चेतक को लगभग 21 फिट की चौड़ाई को फलांगना पड़ता हैं. Many Rajput kings, abandoning their glorious traditions and fighting spirit, sent their daughters and daughters-in-law to the harem of Akbar with the purpose of gaining rewards and honour from Akbar. अकबर ने अक्टूबर 15, 1577 को शाहबाज खां के नेतृत्त्व में एक विशाल सेना कुम्भाल्गढ़ में आक्रमण के लिए भेजा. Maharana Pratap History in Hindi — महाराणा प्रताप का इतिहास Maharana Pratap History in Hindi Language — महाराणा प्रताप का इतिहास 300 words भारत में बहुत से वीर हुए हैं जिनमें से एक महाराणा प्रताप थे जिन्होंने मुगल शासन का विरोध किया था। महाराणा प्रताप उदयपुर में शिशोधिया राजवंश के राजा थे और उनका पूरा नाम राजा महाराणा प्रताप सिंह था। इनका जन्म कुम्भगड़ दुर्ग में 9 मई, 1540 में हुआ था। इनके पिता का नाम राणा उदय सिँह और माता का नाम महाराणी जयवंता कँवर था। महाराणा प्रताप ने अपने पूर्ण जीवनकाल में 11 शादियाँ की थी। महाराणा प्रताप स्वतंत्रता प्रिय थे और वह बचपन से ही दृढ़ निश्चय वाले व्यक्ति थे। उनकी बहादुरी के किस्से आज भी मशहूर है। महाराणा प्रताप का एक सबसे प्रिय घोड़ा था जिसका नाम उन्होंने चेतक रखा था जो बहुत ही बहादुर था। हल्दी घाटी का युद्ध- मेवाड़ और मुगलों के बीच 18 जुन, 1576 का हल्दी घाटी का युद्ध महाराणा प्रताप के जीवन में बहुत अहम था। इन्होंने मुगल शासक अकबर के सामने झुकने से इंकार कर दिया था। इनकी 20000 की संख्या में राजपूत सेना ने मुग्लों की 80000 की सेना का बहुत ही बहादुरी से सामना किया था। हल्दी घाटी की लड़ाई कुल 4 घंटे तक चली थी जिसमें किसी की भी जीत नहीं हुई थी और इसी लड़ाई के दौरान महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की मृत्यु हो गई थी। छोटी सेना होने के बावजुद भी उन्होंने अकबर की सेना को पीछे मुड़ने पर विवश कर दिया था। हल्दी घाटी के युद्ध के बाद पूरे देश में 1879-1885 तक मुगलों के खिलाफ विरोध होने लगे थे और महाराणा प्रताप सभी जगहों पर हुकुमत करने लगे थे। उन्होंने बाद में अपने उदयपुर सहित 36 जगहों पर अधिकार प्राप्त कर लिया था। 29 जनवरी , 1597 को राज्यस्थान में उनकी मृत्यु हो गई थी। उनके पराक्रम और हिम्मत के कारण उनका नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। Maharana Pratap History in Hindi Language — महाराणा प्रताप का इतिहास 500 words जब भारत पर मुग़लों का राज्य था उस समय भारत छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हुआ था। इनमें से कुछ तो मुसलमानों के विरुद्ध संघर्ष करते रहे, परन्तु कुछ ने मुसलमानों की अधीनता स्वीकार कर ली। इस समय भी अनेक ऐसे राज्य थे जो भारत से मुसलमानों को उखाड़ फेंकना चाहते थे। ऐसे राजाओं में दक्षिण में मुसलमानों से लोहा लेने वालों में शिवाजी मरहठ्ठा का नाम सबसे ऊपर आता है और राजपुताने में महाराणा प्रताप का नाम अमर है। महाराणा प्रताप का जन्म चितौड़ में राजा उदय सिंह के यहां उस समय हुआ जब मुसलमान भारत में अपने राज्य को बढ़ा रहे थे। राजपुताने को अपने राज्य में लाना उनका लक्ष्य था। मुसलमानों की शवित अधिक थी। अधिकांश राजपूत राजे पराजित हो गए थे। राजा उदय सिंह भी मुसलमानों का मुकाबला न कर सके। जिसका परिणाम यह हुआ कि चितौड़ का राज्य मुसलमानों के हाथों में चला गया । चितौड़ का राज्य छिनते ही बहुत से हिन्दू राजा मुसलमानों से मिल गए। राजा उदय सिंह अपनी मृत्यु से पूर्व अपने छोटे पुत्र जयमल को राज्य का उत्तराधिकारी बना गया। वह कुशल शासक नहीं था। प्रजा से उसका व्यवहार अच्छा न था। इसी कारण प्रजा और सरदार उससे प्रसन्न नहीं थे। अत: प्रजा ने उसे गद्दी से उतार कर स्वतन्त्रता के लिए सब कुछ बलिदान कर देने वाले राणा प्रताप को राज्य-गद्दी सौंप दी। महाराणा प्रताप दासता से घृणा करते थे। वे अपने राज्य को स्वतन्त्र देखना चाहते थे अतः उन्होंने शपथ खाई कि जब तक चितौड़ को स्वतन्त्र नहीं करवा लेंगे तब तक चैन का जीवन नहीं व्यतीत करेंगे। राणा प्रताप के प्रयत्नों को दबाने के लिए अकबर ने अपने पुत्र सलीम और राजा मान सिंह को एक लाख की सेना देकर राणा प्रताप के विद्रोह को समाप्त करने के लिए भेजा। राणा प्रताप की शक्ति बहुत कम थी, फिर भी उन्होंने मुसलमानों का डट कर मुकाबला किया, लेकिन राणा प्रताप को युद्धक्षेत्र से अपनी जान बचाकर निकलना पड़ा। इस युद्ध-क्षेत्र से बचकर वे जंगलों में चले गए। एक ओर उन्हें सेना इकट्ठी करके चित्तौड़ को स्वतन्त्र करवाने की चिन्ता थी दूसरी ओर जंगलों में उन्हें अनेक कष्ट सहने पड़े। कई बार तो घास खाकर निर्वाह करना पड़ा। इतना ही नही, मुस्लिम सेना उनका जंगलों में भी पीछा कर रही थी.

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Rana Pratap

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दो मुग़ल सैनिको को शक्तिसिंह ने प्रताप का पीछा करते हुए पाया. महाराणा जवान सिंह 1828 — 1838 ई० — निःसन्तान। सरदार सिंह को गोद लिया । 63. न अकबर चैन से बैठा और ना ही उसने महाराणा को चैन की सांसे लेने दी परन्तु उसने अपनी सारी ताकते झोंक कर भी महाराणा को अंतिम रूप से झुका ना पाया. अचानक से महाराणा की नजर मान सिंह पर पड़ी और उसे देखते ही महाराणा का खून खौलने लगा,मानसिंह हाथी पर सवार था, उसके पास अंगरक्षकों का एक बड़ा जमावड़ा था, मानसिंह के सुरक्षा व्यूह को तीर की तरह चीरते हुए, महाराणा का चेतक हाथी के बिलकुल ही नजदीक पहुँच गया, मानसिंह को ख़त्म करने के लिए महाराणा प्रताप ने दाहिने हाथ में भाला संभाला और चेतक को इशारा किया की वह हाथी के सामने से उछल कर गुजरे, चेतक ने महाराणा का इशारा समझ कर ठीक वैसा ही किया, परन्तु चेतक का पिछला पैर हाथी के सूंढ़ से लटका तलवार से चेतक का पैर घायल हो गया, परन्तु महाराणा उसे देख ना पाए, घायल होने के क्रम में ही महाराणा ने पूरी एकाग्रता से भाला को मानसिंह के मस्तक में फेंक डाला, परन्तु चेतक के घायल होने के कारण उनका निशाना चूक गया, और भला हाथी में बैठे महावत को चीरता हुआ लोहे की चादर में जा अटका, तबतक महाराणा की ओर सभी सैनिक दौड़ पड़े, और मानसिंह महाराणा के डर से कांपता हुआ हाथी के हावड़े में जा छिपा,भला हावड़े से टकरा कर गिर गया, राजा मानसिंह को खतरे में देख माधो सिंह कछावा महाराणा पर अपने सैनिकों के साथ टूट पड़े, उसने महाराणा पर प्राण घातक हमला किये. मुगलों से संघर्ष करना उनकी जीवन शैली में शामिल हो गया था. बोलिए, क्या आप सब लोग मेरे साथ कष्ट और संघर्ष का जीवन व्यतीत करने के लिए तैयार है? आओ प्रतिज्ञा करें की हम एक एक सैनिकों को मुगलों के पच्चीस पच्चीस सैनिकों के सिर काटने है, हमारे जीते जी शत्रु हमारी मातृभूमि पर कदम नहीं रख सकेगा, इसके लिए चाहे हमें कोई भी कीमत चुकाने पड़े. राव सुरतान को ये बात बहुत बुरी लगी, उसने जगमाल को चुनौती दे डाली, परन्तु देवड़ा बीजा उसके उसके साथ हो गया और राव सुरतान का शक्ति संतुलन बिगड़ गया.

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महाराणा प्रताप का इतिहास हिंदी में, Maharana Pratap Story in Hindi PDF

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We travel the offbeat roads and bring you the road trips. परन्तु राशन पानी बंद हो जाने के कारण उदय सिंह मुगलों का ज्यादा देर तक सामना न कर सके लगभग 6 महीने की भीषण संग्राम के बाद 23 फरवरी को उदय सिंह को समस्त परिवार के साथ चितौड़ छोड़ना पड़ा, उन्होंने पहाड़ियों से घिरे सुरम्य स्थल उदयपुर को अपनी राजधानी बनाया और फिर वहीँ रहने लगे. Emperor Akbar sent Man Singh as a Chief of his Imperial army and this incident is popularly known as the battle of Haldighati. गुलामी के सौ वर्ष से ज्यादा प्रताप की आजादी का एक पल प्रिय था. Recommend you to read following Places to visit in Rajasthan near Haldighati. राणा प्रताप राजपूत अवश्य है जह्पनाह परन्तु अहंकार ने उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर दी है.

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Maharana Pratap History In Hindi Language

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और दूसरा ये था की उन्हें मन ही मन ये भय सता रहा था की कहीं फिर से महाराणा अपने मुट्ठी भर सैनिकों को लेकर ना आ जाए और अपने घोड़े के तापों तले हमें रौंद डाले. इनसे निपटने के लिए एक विशेष प्रकार की रणनीति बनानी होगी. शक्तिसिंह का अपराध को संगीर्ण अपराध माना गया. सारे राजपूतों को झुकाकर मुग़ल सल्तनत के अधीन करने वाली बात सुन कर मानसिंह के मन इन चुभन सी होने लगी उसने अकबर कहा की आप चिंता ना करे मैं शोलापुर के विद्रोह का दमन करने जा रहा हूँ. उसके नेतृत्व में सही फ़ौज ने कई युद्ध जीते भी थे. परन्तु घायल चेतक उस पार जाने के बाद दुबारा फिर कभी नहीं उठ पाया, महाराणा प्रताप तो सकुशल थे पर एक मूक जीव ने अपने स्वामीभक्ति दिखाते हुए वीरगति को प्राप्त किया और अपना नाम इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में लिखवा गया. Thenafter their grandsons remained since 1330 and till continued as sebayat.

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महाराणा प्रताप का इतिहास

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सब जानते थे की ये आक्रमण मानसिंह के पहल में ही हो रहा है. Shakti Singh and Jagammal, the two brothers of Maharana Pratap had joined Akbar. उनके आँखों से बहते हुए आंसू उनके चेहरे पर लगे हुए खून को धोते रहे. राणा प्रताप ने उदयपुर छोड़ने का आदेश इतनी शक्ति से दे रखा था की जो भी उदयपुर की सीमा में प्रवेश करता उसे मृत्यु दंड दिया जाता. उसके बाद प्रताप अपने सभी साथियों के साथ एक नई सेना के गठन के मुद्दे पर विचार विमर्श करने में जुट गए. उस समय उदय सिंह सो रहे थे और हाथ में नंगी तलवार लिए बनवीर उदय सिंह को मारने आ रहा था, अचानक से महल में हलचल पैदा हो गयी और ये समाचार पन्ना धाय तक भी पहुँच गयी, उस समय पन्ना धाय ने एक ऐसा बलिदान दिया जो की इतिहास में आज तक किसी ने न दिया होगा, उन्होंने उदय सिंह और अपने पुत्र में से उदय सिंह को चुना और अपने पुत्र को उदय सिंह के स्थान पर लिटा दिया, और उदय सिंह को फूलों की टोकरी में छिपा दिया, जब बनवीर ने पूछा की उदय सिंह कहाँ है, तो उसने अपने पुत्र को उदय सिंह बता दिया और बनवीर ने पन्ना धाय के सामने उसके पुत्र की हत्या कर दिया. वे जानते थे की अकबर से युद्ध करना सर्वनाश को आमंत्रण देना है, परन्तु वे ये भी जानते थे की अकबर के सामने स्वेच्छा से झुक जाना और उसकी अधीनता को स्वीकार कर लेना अपमानजनक ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए घातक है.

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महाराणा प्रताप जयंती स्पेशल : महाराणा प्रताप की जीवनी और इतिहास

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Besides, he also freed a large portion of land in Rajasthan from the Mughals. Self-respect and virtuous behaviour were the main qualities of Pratap Singh. Rajputs fought bravely but at some point in time, Maharana Pratap was injured and unconscious. दोनों सेनाओं ने मिल कर महाबत खान की सेना को घेर लिया. जब अकबर ने युद्ध से लौटे सैनिकों की समीक्षा की तो उसे ये भरोसा हो गया की वो केवल नाम का ही युद्ध जीता है महाराणा का आतंक उनके चेहरे में से साफ़ साफ़ नजर आ रहा था. प्रताप स्वदेश पर अभिमान करने वाले, स्वतंत्रता के पुजारी, दृढ़ प्रतिज्ञ और एक वीर क्षत्रिये थे. उनके साथ उस समय झालामान,झाला बीदा, डोडिया भीम, चुण्डावत किशन सिंह, रामदास राठोड, रामशाह तोमर, भामाशाह व् हाकिम खां सूर आदि चुने हुए व्यक्ति थे.

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